Quantcast
Channel: विजयशंकर की कविताएँ
Browsing index pages (52 articles)
↧

चाँदनी की रश्मियों से चित्रित छायाएँ

प्रेम कई तरह से आपको छूता है, स्पर्श करता है. आपकी साँसों को महका देता है। और यह सब इतने महीन और नायाब तरीकों से होता है कि कई बार आप उसे समझ नहीं पाते। यह एक तरह का जादू है। यह कभी भी, कहीं भी फूट...

View Article


सिर्फ एक बार

मुझे आने दो हँसते हुए अपने घर एक बार मैं पहुँचना चाहता हूँ तुम्हारी खिलखिलाहट के ठीक-ठीक करीब जहाँ तुम मौजूद हो पूरे घरेलूपन के साथ...

View Article


प्रेम हमारा

तुम वे फूल चढ़ा सकती थीं मंदिर में या खोंस सकती थीं जूड़े में मगर रख आईं समंदर किनारे रेत पर मेरा नाम खोदकर....

View Article

किसके नाम है वसीयत

झाँझ बजती है तो बजे मँजीरे खड़कते हैं तो खड़कते रहें लोग करते रहें रामधुन पंडित करता रहे गीता पाठ मेरे सिरहाने नहीं, मैं ऐसे नहीं जाऊँगा। आखिर तक बनाए रखूँगा भरम कि किसके नाम है वसीयत किस कोठरी में गड़ी...

View Article

खिड़की

बाबा की खिड़की से हवा चली आती है दरख्तों के चुंबन ले रात-बिरात पहचान में आती हैं ध्वनियाँ मिल जाती है आहट आनेवाले तूफान की अंधेरे- उजाले का साथी शुक्रतारा दिखाई देता है यहाँ से

View Article


चेहरे थे तो दाढ़ियाँ थीं

चेहरे थे तो दाढ़ियाँ थीं बूढ़े मुस्कुराते थे मूछों में हर युग की तरह इनमें से कुछ जाना चाहते थे बैकुंठ कुछ बहुओं से तंग़ थे चिड़चिड़े कुछ बेटों से खिन्न पर बच्चे खेलते थे इनकी दाढ़ी से और डरते नहीं थे ....

View Article

आखिर कब तक

गाँठ से छूट रहा है समय हम भी छूट रहे हैं सफर में

View Article

वजह नहीं थी उसके जीने की

पहला तीखा बहुत खाता था इसलिए मर गया दूसरा मर गया भात खाते-खाते तीसरा मरा कि दारू की थी उसे लत चौथा नौकरी की तलाश में मारा गया पाँचवें को मारा प्रेमिका की बेवफाई ने .....

View Article


समय गुजरना है बहुत

बहुत गुजरना है समय दसों दिशाओं को रहना है अभी यथावत खनिज और तेल भरी धरती घूमती रहनी है बहुत दिनों तक वनस्पतियों में बची रहनी हैं औषधियाँ ...

View Article


कपास के पौधे

कपास के ये नन्हें पौधे क्यारीदार जैसे असंख्य लोग बैठ गए हों छतरियाँ खोलकर पौधों को नहीं पता उनके किसान ने कर ली है आत्महत्या...

View Article

मिट्टी के लोंदों का शहर

अंतरिक्ष में बसी इंद्र नगरी नहीं न ही पुराणों में वर्णित कोई ग्राम बनाया गया इसे मिट्टी के लोंदों से राजा का किला नहीं यह नगर है बिना परकोटे का.....

View Article

दुनिया अभी जीने लायक है

मैं सोचता था पानी उतना ही साफ पिलाया जाएगा जितना होता है झरनों का चिकित्सक बिलकुल ऐसी दवा देंगे जैसे माँ के दूध में तुलसी का रस मैं जहर खाने जाऊँगा....

View Article

नौकरी पाने की उम्र

जिनकी चली जाती है नौकरी पाने की उम्र उनके आवेदन पत्र पड़े रह जाते हैं दफ्तरों में तांत्रिक की अँगूठी भी ग्रहों में नहीं कर पाती फेरबदल नहीं आता बरसोंबरस कहीं से कोई जवाब...

View Article


जनहित याचिका

न्यायाधीश, न्याय की भव्य-दिव्य कुर्सी पर बैठकर तुम करते हो फैसला संसार के छल-छद्म का दमकता है चेहरा तुम्हारा सत्य की आभा से। देते हो व्यवस्था इस धर्मनिरपेक्ष देश में...

View Article

बारिश में स्त्री

बारिश है या घना जंगल बाँस का उस पार एक स्त्री बहुत धुँधली मैदान के दूसरे सिरे पर झोपड़ी जैसे समंदर के बीच कोई टापू....

View Article


कदम आते हैं

कदम आते हैं घिसटते हुए लटपटाते हुए कदम आते हैं कदम आते हैं बूटदार खड़ाऊदार कदम आते हैं...

View Article

आती थीं ऐसी चिट्ठियाँ

आती थीं ऐसी चिट्ठियाँ जिनमें बाद समाचार होते थे सुखद अपनी कुशलता की कामना करते हुए होती थीं हमारी कुशलता की कामनाएँ....

View Article


चंद आदिम रूप

बाढ़ में फँसने पर वैसे ही बिदकते हैं पशु जैसे ईसा से करोड़ साल पहले। ठीक वैसे ही चौकन्ना होता है हिरन शेर की आहट पाकर...

View Article

जन्मस्थान

कितने ईसा कितने बुद्ध कितने राम कितने रहमान

View Article

देवता हैं तैंतीस करोड़

बहुत दिनों से देवता हैं तैंतीस करोड़ उनके हिस्से का खाना-पीना नहीं घटता वे नहीं उलझते किसी अक्षांश-देशांतर में वे बुद्घि के ढेर इंद्रियाँ झकाझक उनकी सर्दी-खाँसी से परे ट्रेन से कटकर नहीं मरते रहते हैं...

View Article
Browsing index pages (52 articles)


Latest Images